ज्वालाजी मंदिर (ज्वालामुखी मंदिर) – कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश

ज्वालाजी मंदिर, जिसे ज्वालामुखी मंदिर भी कहा जाता है, हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले में स्थित एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थस्थल है। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है और माँ ज्वालामुखी को समर्पित है, जिन्हें ‘अग्नि मुखी देवी’ या ‘फ्लेमिंग माउथ’ के रूप में पूजा जाता है।

पौराणिक कथा

मान्यता है कि जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंगों को पृथ्वी पर वितरित किया, तब उनकी जिह्वा (जीभ) यहाँ गिरी थी। तभी से यह स्थान शक्ति पीठ के रूप में पूजनीय है।

नौ ज्वालाएँ और देवियाँ

मंदिर में प्राकृतिक रूप से निकलने वाली नौ ज्वालाएँ निरंतर प्रज्वलित रहती हैं। ये नौ ज्वालाएँ नौ देवियों का प्रतीक हैं:

  • महाकाली

  • अन्नपूर्णा

  • चंडी

  • हिंगलाज

  • विद्यावसिनी

  • महालक्ष्मी

  • सरस्वती

  • अंबिका

  • अंजी देवी

स्थान और महत्व

  • ज्वालाजी मंदिर, ज्वालामुखी उप-मंडल में स्थित है।

  • समुद्र तल से लगभग 600 मीटर ऊँचाई पर, शिवालिक पर्वत श्रृंखला की कालिधर घाटी में बसा है।

  • यहाँ सालभर देशभर से लाखों श्रद्धालु माँ ज्वालाजी के दर्शन करने आते हैं।

ज्वालामुखी मंदिर को खोजने का श्रेय पांडवों को दिया जाता है। मान्यता है कि यहां देवी सती की जीभ गिरी थी। यहां नौ स्थानों से ज्वालाएं निकलती हैं जिन्हें महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका और अंजीदेवी के नाम से जाना जाता है। प्रारंभिक निर्माण राजा भूमि चंद ने करवाया था, बाद में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसारचंद ने 1835 में इसे पूर्ण रूप दिया।

ऐतिहासिक प्रसंग

बादशाह अकबर ने इन ज्वालाओं को बुझाने की कोशिश की थी, लेकिन असफल रहा। उसने देवी मां को सवा मन सोने का छत्र चढ़ाया, जिसे माता ने स्वीकार नहीं किया। आज भी वह छत्र मंदिर में रखा हुआ है। ब्रिटिश काल में भी वैज्ञानिकों ने इन ज्वालाओं के रहस्य को समझने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली।